यही तो हमारे जीवन की परम प्यास है...
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पंकज
‘स्वदेशी’ दिव्य प्रकाशन
स्वस्थ शरीर एवं उत्तम विचारों से जीवन में संसार के सब सुखों को प्राप्त किया जा सकता है और सब धन-धान्य-ऐश्वर्य होते हुए भी यदि शरीर स्वस्थ नहीं है या विचार उत्तम नहीं हैं तो दु:खों का जमघट जीवन में लगे रहना कोई आश्चर्य की बात नहीं है। यह संसार ऐसे अनुभवों से भरा हुआ है। ऐसा नहीं है कि मनुष्य को इसका आभास नहीं है। परन्तु संस्कार व स्वभावों के दोषों के कारण, अज्ञान के कारण सुख का मार्ग पता होते हुए भी अंधकार में हम अज्ञानी जिए जा रहे हैं। अन्धकार से प्रकाश, अज्ञान से ज्ञान और अबोध से बोध की राह यदि हमें प्राप्त हो जाए तो जीवन में सदा बने रहने वाले शुभ का शुभारम्भ हमें प्राप्त हो सकता है।
ऋषियों की परम महान चेतना से अनुभूत हैं पांडुलिपियाँ -
पांडुलिपियों और ताडपत्रों में हस्तलिखित ऐसे कथन जिसे हमारे महान तपस्वी ऋषियों ने अपनी परम महान चेतना से अनुभूत किया है, जो जगत के किसी भी स्थान पर मनुष्य को सुख व आनंद प्रदान करने के लिए व्यावहारिक ज्ञान प्रदान करने में समर्थ है। यह हमारा परम सौभाग्य है कि ऐसी पाण्डुलियों (Manuscripts) का आशीर्वाद भारत की महान पुण्य धरा पर उपलब्ध है। महर्षि वाग्भट जी द्वारा रचित (अष्टांगहृदयम्) में आयुर्वेद के सम्पूर्ण विषय- कायचिकित्सा, शल्यचिकित्सा, शालाक्य आदि आठों अंगों का वर्णन है। उन्होंने अपने ग्रन्थ के विषय में स्वयं ही कहा है कि, यह ग्रन्थ शरीर रूपी आयुर्वेद के हृदय के समान है। जैसे- शरीर में हृदय की प्रधानता है, उसी प्रकार आयुर्वेद वाङ्मय में अष्टांगहृदयम्, हृदय के समान है। अपनी विशेषताओं के कारण यह ग्रन्थ अत्यंत लोकप्रिय हुआ। वैद्यराज सुषेणदेव द्वारा रचित (आयुर्वेद-महोदधि), आयुर्वेद विशेषज्ञ पण्डित रघुनाथ सूरी द्वारा रचित (भोजन कुतूहलम) इनमें आहार-द्रव्यों के गुण व स्वरूप, का विषद वर्णन किया गया है। प्रत्येक व्यक्ति को कैसा आहार-विहार अपनाना चाहिए, जिससे वह रोगों से बचते हुए सदा स्वस्थ, बलवान व प्रसन्न रह सके इसका वर्णन इसमें रोचक व सरल रूप में किया गया है। आचार्य रविगुप्त द्वारा रचित (सिद्धसार-संहिता) के स्वाध्याय से अल्प सामर्थ वाले व्यक्ति भी आयुर्वेद के सारतत्त्व को जान सके तथा वह स्वयं के स्वस्थ की रक्षा रखते हुए अन्यों के स्वास्थ्य की भी रक्षा कर सकें इस उद्देश्य से इस शास्त्र की रचना की गई।
माधुक पण्डित द्वारा विरचित (हरमेखला) में कौतुहल, दुष्ट शत्रु दमन चिकित्सा, गंधशास्त्र, भोजन पाक विधि आदि रुचिकर विषय वर्णित है। आचार्य अमितप्रभ द्वारा रचित (योगशत-वैद्यवल्लभा) अगाध आयुर्वेद सागर में से प्राप्त अमृत को सरल, संक्षिप्त एवं सम्पूर्ण 100 श्लोकों में आयुर्वेद का सार समाहित करने का चमत्कारी प्रयास इस ग्रन्थ के रूप में देखने को मिलता है। बिन्दूभट्ट द्वारा रचित (बिन्दुसार), वैद्य वाल्मीक द्वारा रचित (कुमारामृतम), महान आयुर्वेदज्ञ पंडित बोपदेव जी द्वारा रचित हृदयदीपक निघण्टु, आदि महापुरुषों ने मानव मात्र के कल्याण की पवन अभिलाषा के साथ विभिन्न शास्त्रों की रचना की।
ऋषियों के ज्ञान को मिला पतंजलि में सम्मान -
पतंजलि ने किया दुर्लभ पांडुलिपियों का संरक्षण, शोधन, अनुवाद व प्रकाशन
ऐसे सैकड़ों प्राचीन शास्त्र जो यत्र-तत्र उपलब्ध थे, उन ग्रन्थों की मूल हस्तलिखित प्रतियों पांडुलिपियों का अन्वेषण कर उनके आधार का मूलपाठ का शोधन, उत्तम संपादन व सुगम अनुवाद कर वर्तमान युग के आयुर्वेद महान पंडित आचार्य बालकृष्ण जी महाराज के दिव्य आलोक में विद्वानगणों की टीम के द्वारा अद्वितीय कार्य किया गया है।
पांडुलिपियों पर अनुसंधान कर पतंजलि कर रही जीवन रक्षक औषधियों निर्माण -
हमारे महान महर्षि, विद्वान आचार्य वैद्यों, पूर्वजों द्वारा अपने हाथों से लिखित एक लाख से अधिक पांडुलिपियों को देश के विभन्न स्थानों से दुर्दशा और जीर्ण-शीर्ण स्थिति में प्राप्त कर पतंजलि अनुसंधान केंद्र की 350 से अधिक वैज्ञानिकों की टीम के द्वारा न केवल इन्हें सुरक्षित किया गया है अपितु ऋषियों द्वारा बताए गए मार्ग से मानव की जीवन रक्षक औषधियों का भी इसमें अनुसंधान एवं निर्माण कार्य चल रहा है। ऋषियों के महान ज्ञान को यदि भारत में कहीं सम्मान प्राप्त हो रहा है तो पतंजलि अनुसंधान केंद्र का नाम इसमें सबसे प्रथम आता है और न केवल सम्मान योगऋषि परम पूज्य स्वामी रामदेव जी महाराज की पावन प्रेरणा से ऋषियों के ज्ञान का गौरव ज्ञान भी पुस्तकों, साहित्यों एवं शास्त्रों के माध्यम से दिव्य प्रकाशन की सेवा से हो रहा है।
इन महान ग्रन्थों में दिए गए ज्ञान को हमें अपने जीवन में अवश्य अपनाना चाहिए। यह ग्रन्थ ही है, जो हमें सुख, समृद्ध एवं स्वस्थ-खुशहाल जीवन प्रदान कर सकते हैं। यही तो हमारे जीवन की परम प्यास है। सुख आखिर किसको प्रिय नहीं है? और प्रिय है तो हमें प्रयास तो करना ही चाहिए, इन शास्त्रों का स्वाध्याय करने का। पतंजलि योगपीठ हरिद्वार से आपके द्वार पर साहित्य सेवा को उपलब्ध करवाने के लिए दिव्य प्रकाशन अपनी सेवा में तत्पर है। देश के लाखों परिवार, विद्यालय एवं महा-विद्यालय भी हमसे जुड़े हैं। आपका भी हम हृदय से स्वागत करते हैं। आप भी हमारी वेबसाइट www.divyaprakashan.com एवं 7302732334 व 7302732335 से हमसे संपर्क कर हमें सेवा का अवसर प्रदान करें।
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