कविता

कविता

प्रफुल्ल चंद्र कुँवरबागी

रेशमी शहर, भागलपुर, बिहार

दैनंदिनी
जिसका जीवन योगमय, जड़-चेतन वह योग्य।
कर्म कुशलता, भावसम, अनुशासन, आरोग्य।।१।।
स्मृति-लोपन की समस्या, ले यदि स्थायी रूप।
लें कागज दैनंदिनी, स्मार्ट फोन रख चूप।।२।।
लिखना-पढऩा डायरी, दे दिमाग व्यायाम।
अगले दिन का कार्यक्रम, रोज बना आराम।।3।।
महत्त्वपूर्ण तारीख को, अंकित करें सुलेख।
सोने के पहले उसे, एक बार लें देख।।४।।
क्रमश: जब मानस-धरा, अनुकूलित हो जाय।
बिना डायरी की मदद, ‘‘विस्मरण’’को बिसराय।।५।।
 
जीवनशैली  एवं आहार
तन-मन दोनों चाटते, मादक मांसाहार।
तन-मन दोनों के लिए, हितकर शाकाहार।।१।।
अमृतान्न, फल-सब्जियां, हर घंटे जलपान।
स्मृति को बेहतर करे, योग, साधना, ध्यान।।२।।
जीवन जीना कला है, शैली, विधि, शृंगार।
विकृति लाती प्रकृति में, जीवन कई विकार।।३।।
निकले स्वर बाहर मधुर, व्यंजन भीतर जाय।
स्वर-व्यंजन की मधुरता, वसुधा स्वर्ग बनाय।।४।।
जंक फूड भी डंक दे, देते स्वास्थ्य बिगाड़।
युक्ताहार-विहार हो, जीवनशैली सुधार।।5।।
प्राणायाम कर भ्रामरी, अरु अनुलोम-विलोम।
क्रोध, लोभ, मत्सर, अहं, राग-द्वेष कर होम।।६।।
भूलेंगे सब भूलना, कर चारो उपचार।
गीता अरु दैनंदिनी, व्यायाम, आहार।।७।।
 
व्यायाम
मस्तिष्कों को चाहिए, लगातार व्यायाम।
सही ढंग नियमित करें, लगते ‘‘भूल’’विराम।।१।।
चाबी गर तुम भूलते, डालें खूँटी खास।
शुभतिथि/दिवस स्मरण रखें, दैनंदिन अभ्यास ।।2।।
खोई वस्तु, गुम कोई, लायें नहीं विषाद।
तनिक शांत-विश्रांत हों, आसानी से ‘‘याद’’।।3।।
धीरे-धीरे इस कदर, याददाश्त कमजोर।
खूब सजग मस्तिष्क हो, स्मरण करे बेजोड़।।4।।
नई जगह को खोजना, कितना मुश्किल काम।
बार-बार जाते जहाँ, स्मृति में आठों याम।।5।।
अत: जरूरी ज्ञान को, भरें ‘‘ब्रेन’’ बहु बार।
फिर भी स्मृति धोखा करे, हिम्मत ना दें हार।।6।।
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