हिपेटाइटिस, लीवर सिरोसिस तथा लीवर कैंसर
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डॉ. नागेन्द्र कुमार ‘नीरज’
निर्देशक व चिकित्सा प्रभारी- योगग्राम
लीवर जब क्षतिग्रस्त हो चुका है, भलिभांति अपना काम नहीं कर पा रहा है तो उपर्युक्त तथा विभिन्न लीवर रोग तथा लीवर सिरोसिस लीवर फेल्योर की स्थिति में पहुँचने लगता है। प्रारम्भ में इसका लक्षण नहीं दिखता है। लेकिन कुछ समय बाद निम्न लक्षण परिलक्षित होने लगते है। इसमें (1) पीलिया, (2) अतिसार, (3) भ्रम (Confusion) (4) थकान, (5) कमजोरी, (6) मितली एवं उल्टी, उदर में रक्तस्त्राव, हिपेटिक एन्सफेलोपैथी, लीवर तथा प्लीहा वृद्धि आदि (7) पेट में पानी भरना (Ascitis), (8) पेट के दाहिनी तरफ दर्द लक्षण दिखते हैं।
एस्ट्रोजन का लेवल बढऩे से त्वचा पर छोटी-छोटी कोशिकाए मकड़ी के जाले की तरह स्पाइडर एन्जियोमॉस (Spider angiomos) तथा चेरिएन्जियोमॉस (Chcrriangiomos) संरचना दिखने लगती है। पित्त के सीधे खून में मिलने से त्वचा के नीचे जमा होने लगता है फलत: त्वचा में खुजली होने लगती है। लीवर सिरोसिस, विल्सनडिजीज, हिमोक्रोमेटोसिस आदि लीवर रोग तथा गर्भावस्था में हार्मोनल उतार चढ़ाव के कारण, पैर तथा हाथों की सूक्ष्म रक्तवाहिनियाँ विस्फारित होने से रक्त सतह पर आ जाता है इसे ही पामर एरिथेमा (Palmer Erythema) लीवर पाम, रेड पाम यानि हथेली एवं पगतली लाल हो जाते हैं। इसे लान्स रोग (Lane’s Disease) भी कहते हैं। लाल हथेली के लक्षण मधुमेह, थॉयरॉयड टॉक्सिकोसिस, शराब, धूम्रपान, मर्करी पॉयजनिंग, एड्स, ब्रेन ट्यूमर तथा ऑटो-इम्यून रोग में कभी-कभी पामर एरिथेमा के लक्षण दिखता है।
रक्त का थक्का (Blood Cloting) बनने से रोकने के लिए लीवर लंग्स तथा मास्ट तथा बेसोफिल रक्त कोशिकाएँ हिपेरिन (वारफेरिन) का निमार्ण करती है। लीवर हिपेरिन तथा एण्टी कोएग्यूलेन्ट प्रोटीन सी तथा प्रोटीन एस और एण्टीथ्रोम्बिन III प्रोटीन निर्माण करता है। लेकिन लीवर के क्षतिग्रस्त होने या जन्म जात बीमारी में फैक्टर वी जीन में परिवत्र्तन (Mutation) होने से प्रोटीन सी की सक्रियता बढ़ जाती है। हिपेटिक वेन तथा हिपेटिक आरटरी नील पड़ जाती है। उनसे खून के चक्कते (Clot) बनने की प्रक्रिया भी तेज हो जाती है परिणामत: त्वचा रक्तवाहिनियाँ भी क्षतिग्रस्त होती है तथा जगह-जगह नील पड़ जाती है और खून भी निकलने लगता है।
Fetor Hepaticus में वोलाटाइल सल्फर कम्पाउण्ड डाइमिथाइल सल्फाइड, एसिटोन, ब्यूटानोन तथा पेन्टानॉन, मिथाइलमर वैफप्टन, हाइड्रोजन सल्फाइड की मात्रा रक्त में बढ़ जाती है। प्राय: लीवर के जटिल रोगों सिरोसिस के कारण पोर्टल हाइपरटेन्शन हो जाता है। पोर्टल हाइपरटेन्शन के चलते उपर्युक्त टॉक्सिक दुर्गन्धित रसायन छनकर फेफड़े में पहुच जाता है। जिससे लीवर डैमेज वाले रोगी के मुँह एवं श्वासों से दुर्गन्ध आनी शुरू हो जाती है, इस स्थिति को Fetor Hepaticus कहते हैं। इतना ही नहीं इन गैसों के साथ ट्राइमिथाइल एमिन तथा अमोनिया भी जुड़ जाते हैं। यह हिपेटोसेलुलर फेल्योर तथा ऑनसेट ऑफ हिपेटिक एन्सेप्लोपैथी की स्थिति को प्रदर्शित करता है।
मुँह से बदबू आना लीवर डैमेज का लक्षण भी हो सकता है। लीवर सही ढ़ंग से काम नहीं करता है तो वोलाटाइल सल्फर कम्पाउण्ड (VSCS) फ्रूटी जैसी बदबू आती है। मिथाइल मरकैप्टन तथा हाइड्रोजन सल्फाइड (H2S) क्षतिग्रस्त लीवर से पैदा हुई मुँह के बदल कर फेटोर हिपैटिकस (Fetor Hepaticus) कहते है। पोर्टलहाइपर टेन्सन के कारण लीवर से रक्त प्रवाह रूक जाता है। टॉक्सिक पदार्थ छन कर फेफड़े में पहुँच जाता है। उसी से बदबू आती है।
लीवर रोग की अंतिम स्थिति में रोगियों में पोर्टल हाइपरटेन्शन तथा प्लेटलेट्स की कमी कारण लीवर में रक्त संचार में रूकावट आ जाती है। इससे ओएसोफेजियल वेरीसेस यानि गले की रक्तवाहिनियाँ क्षतिग्रस्त हो जाती हैं जिससे रक्त स्त्राव होने लगता है। लीवर में रक्त का थक्का जमा होने या स्कार टिशूज के कारण ऐसा होता है।
पाचक अंगों से रक्त को लीवर तक पहुँचाने वाली पोर्टल वेन में रक्तचाप बढ़ जाता है। ऐसा प्राय: लीवर सिरोसिस रोग अथवा लीवर की रक्तवाहिनियाँ में थक्का जमने (Thrombosis) से उत्पन्न रूकावट के कारण होता है। पोर्टल हाइपरटेन्शन के कारण लीवर तथा स्प्लीन (तिल्ली, प्लीहा) बढ़ जाता है। आमाशय तथा गले एसोफेगस का वेन्स फूल (Varices) जाती है। आन्तरिक हेमारॉयडस, वजन की कमी कुपोषण, फेफड़े तथा पेट में पानी भरना एसाइटिस तथा गुर्दे एवं फेफड़े के कार्य अस्त-व्यस्त होता है।
शरीर की सबसे बड़ी ग्रंथि लगभग 350 पौण्ड की लीवर में दायाँ तथा बायाँ दो मुख्य लोब होते हैं। दाहिना लोब बायें से 5-6 गुना बड़ा होता है। दोनों लोब्स चार लोब्स दायाँ, बायाँ कॉडेट (दुमदार) तथा क्वाड्रेट (चौकोर) में विभक्त है। क्वाड्रेट लोब दाहिने लोब के नीचे (Inferior) तथा कॉडेट लोब बायें तथा दाहिने लोब के मध्य में आगे की ओर स्थित है। दोनों लोब में 8 सेगमेन्ट होते हैं। सेगमेन्ट में छोटे-छोटे लाबुल्स होते हैं।
प्रत्येक लोबुल्स में हजार से अधिक षट्कोणाकार (Hexagonally Shaped) नन्हे लोबुल्स होते हैं जिनमें असंख्य लीवर कोशिकाए हिपेटोसाइट्स होती हैं। ये कोशिकाएँ मेटाबॉलिज्म, डिटॉक्सीफिकेशन, रक्त का फिल्ट्रेशन, भोजन का पाचन, प्रोटीन संश्लेषण, अनेक विटामिन तथा मिनरल्स का स्टोर करना तथा जीवन के लिए उपयोगी 500 प्रकार के जैव रसायनिक औषधियों का निर्माण आदि अनेक कार्य करती है।
लीवर फंक्शन जाँच में SGPT तथा SGOT की वृद्धि लीवर कोशिकाओं के डैमेज होने, पित्त स्त्रावित कोशिकाओं में मौजूद अल्कलाइन फॉस्फेट की अत्यधिक उपस्थिति लीवर से निकलने वाली पित्त प्रवाह की रूकावट, रक्त में अमोनिया, बिलुरूबिन की उपस्थिति, लीवर की खराबी, एल्बुमिन की मौजूदगी लीवर की स्थिति को प्रदर्शत करता है।
लीवर सिरोसिस को पहली स्थिति में लीवर में फैट (चर्बी) का जमाव होने से लीवर के आकार में वृद्धि होती है। ऐसी स्थिति में सजग होना चाहिए। खान-पान में सुधार आवश्यक हो जाता है। उनमें प्रदाह शुरू हो जाता है। दूसरी अवस्था में लीवर की स्वस्थ कोशिकाएँ सूजन के कारण नष्ट होने से उनमें क्षत उत्तकों (Scar tissue) की संख्या में वृद्धि होकर फाइब्रोसिस की स्थिति पैदा होती है। तीसरी अवस्था सिरोसिस की होती है। यकृत में इतनी क्षत कोशिकाओं की वृद्धि होती है कि लीवर कोशिकाओं का काम करना मुश्किल हो जाता है।
वजन का तेजी से कम होना, उदर दर्द, आँख एवं त्वचा पीली, लीवर द्वारा डिटॉक्सीफिकेशन नहीं होने से लीवर एनसेफेलोपैथी यानि मस्तिष्क की क्रियाओं में गड़बड़ी शुरू हो जाती है। संक्रमण, दस्त एवं रक्तस्त्राव बढ़ जाता है रोगी की स्थिति भयावह हो जाती है। भ्रम, मीठी बासी गंध, हाथ कम्पन, उल्टा-पुल्टा बोलना आदि मानसिक रोग लक्षण, उल्टी, रक्तस्त्राव, देह द्रव में वृद्धि से रक्तायतन में वृद्धि, लीवर पोर्टल हाइपरटेन्सन के कारण गले के शिराओं में वृद्धि एवं सूजन के कारण शिराओं के क्षतिग्रस्त होने से रक्तस्त्राव जो उल्टी तथा मल द्वारा निकलता है, काला पाखाना आता है। रोग बढऩे पर मूच्र्छा, पीला पडऩा, अनियमित सांस गति एवं हृत् धडक़न, बेहोशी की स्थिति पैदा हो जाती है।
लीवर रोगों की जांच के लिए लीवर फंक्शन टेस्ट, हिपेटाइटिस वायरल लोड, अल्ट्रासाउण्ड, सी.टी. स्कैन तथा बायोप्सी कराया जाता है। कथित एलोपैथी चिकित्सा में लीवर रोगों का कोई इलाज नहीं है। इसका मुख्य इलाज प्राकृतिक चिकित्सा एवं आहार, योग एवं आयुर्वेद का सम्यक प्रयोग ही है।
प्राकृतिक चिकित्सा- गरम ठण्डा सेक पेडू तथा लीवर का देकर मिट्टी की पट्टी दें। पुन: नीम के पानी में एक नींबू निचोड़ कर एनिमा दें। पुन: रोगी के स्थिति के अनुसार गरम ठण्डा कटि स्नान, वाष्प स्नान, गरम ठण्डा कम्प्रेश खास करके लीवर का, सावना बाथ, पूर्ण टब इमरसन बाथ, सर्कुलर बाथ, गीली चादर लपेट, सर्वांग मिट्टी की लेप, मडपूल स्नान, व्हर्लपूल, रेत स्नान आदि योगग्राम में मौजूद 125 जल चिकित्सा की प्रविधियाँ के साथ सूर्य स्नान, कलर थर्मोलियम, ग्रीन हाउस थर्मोलियम, अभ्यान्तर एवं बाह्य वायु स्नान दें।
लीवर कैंसर तथा लीवर के अन्य रोगों में कॉफी एनिमा का प्रभाव अतुल्य होता है। बहुत सारी खोजों से ज्ञात हुआ है कि दिन में 2-3 बार कॉफी एनिमा तथा कॉफी पीना लीवर के उपरोक्त सभी रोगों में बहुत लाभ होता है।
एनिमा के लिए 50 ग्राम कॉफी बीज को मिक्सी में पीसकर एक लीटर पानी में 3 मिनट अच्छी तरह उबालें, पुन: उसे कम तापमान पर 15 मिनट तक धीरे-धीरे गरम करें ताकि 600 ग्राम तक बच जाये। सुबह-दोपहर एवं शाम में 15 दिन तक रोगी को घुटना एवं छाती के बल लिटाकर कॉफी एनिमा दें। 18-20 मिनट तक रोकने का प्रयास करें। इस एनिमा का जादुई प्रभाव होता है। इसके प्रभाव से ग्लूटेथिओन लीवर को जहरीले टॉक्सिन्स तथा प्री-रेडिकल को बाहर निकालता है तथा इनसे बचाता है। बढ़े हुए रोग मार्कर एन्जाइम सामान्य स्तर पर आ जाते हैं।
रक्त सिरम तथा इनके घटकों की पूर्णतया सफाई हो जाती है। वे विषमुक्त हो जाते हैं। यह काफी द्रव वायटल द्रव का काम करता है, लीवर से गुजर कर उन्हें कैफिनेटेड कर देता है। कॉफी एनिमा रोकने से आंत्रिक विसरल नर्वस सिस्टम के उद्यीपन से आंत की सर्पिल गति (Peristalsis) प्रक्रिया बढ़ जाती है। इससे बाइल पतला हो जाता है। उसका बहाव तेज हो जाता है। टॉक्सिक बाइल के फ्लश एवं सफाई होने से शरीर का एन्जाइमेटिक उत्प्रेरक (Catadyst)
ग्लूटाथिओन-एस-ट्रान्सपफेरेस (GST) सुप्रभावित होता है। शरीर में इसका लेवल 700 प्रतिशत तक बढ़ जाता है। जिसका शानदार प्रभाव प्री-रेडिकल्स तथा टॉक्सीडेन्टो के निष्कासन एवं उदासीन करने पर होता है। वे खतरनाक जहरीले टॉक्सीडेन्ट लीवर, गौल ब्लैडर से ड्यूडिनम में आ जाते हैं तथा पाखाने से बाहर निकल जाते है। GST लीवर कैंसरकारी तत्वों को जरूरत के अनुसार ऑक्सीडेशन तथा रिडक्शन प्रक्रिया द्वारा नष्ट कर निकाल बाहर करता है।
कॉफी में मौजूद थियोफाइलिन तथा थियोब्रोमिन रक्तहिनियों को विस्फारित करके रक्त प्रवाह को नियमित करता है ताकि लीवर को भरपूर ऑक्सीजेनेटेड रक्त मिलता है जिससे इन्फ्लामेशन तथा ट्यूमर दोनों को दूर करने में सहायता मिलती है। 15 से 21 मिनट तक एनिमा रोकने से प्रत्येक तीसरे मिनट यानि 5 से 7 बार लीवर से गुजरते समय सारे शरीर का शुद्धिकरण करता है। आँतों की दीवार से गुजरने वाला एनिमा का कॉफी द्रव रक्त डायलाइसिस (अपोहन) या नैसर्गिक रक्तशोधन का काम करता है। कॉफी एनिमा से पोटेशियम आयन का उपयोग उन्नत होता है, सोडियम सतत् कम होता है, यानि दोनों आयनों का नियमन एवं नियंत्रण होता है। माइट्रोकॉण्ड्रियल सक्रियता बढ़ जाती है। शरीर की ऊर्जा लेवल बढ़ जाता है। माइक्रोन्यूट्एिन्ट की आपूर्ति एवं अवशोषण दोनों बढ़ जाती है।
आहार चिकित्सा- मोटापा कम करने वाले आहार में ठण्ड के दिनों में लौकी का सूप, गर्मी के दिनों में लौकी, टमाटर, पालक, धनिया, पुदीना, अदरख का मिश्रित रस पर कुछ दिन तक रहें। गाजर, चुकन्दर, आंवला, शलगम, टमाटर, हल्दी का भरपेट सलाद या रस बनाकर पीयें। फाइबर वाले आहार से लीवर शानदार ढंग से काम करता है। पालक, गाजर, ककड़ी, खीरा, गांठ गोभी, मूली शलगम, टिण्डा, हरा प्याज की पत्तियाँ, धनिया, पुदीना, मूली पत्ता, लेट्स आदि सब्जियाँ तथा विविध अंकुरित अनाजों का सलाद चाट प्याज, नींबू हरी मिर्च, दही डालकर बना कर खायें। फलों में आम, पपीता, अमरूद, कीवी, संतरा, मौसम्मी, चकोतरा, तरबूजा, खरबूजा, आडू, आलू बुखारा, बेर प्रारम्भ में भी यकृत रोगों पर शेर पर सवासेर, नहले पर दहला सिद्ध होते है। लीवर रोगों के लिए सभी पत्ते वाली सब्जियाँ उबाल कर खाना सर्वोत्तम औषधि है। अनाज में सर्वांग (Whole) अन्न की दृष्टि से गेहूँ, मूंग, मोठ, मसूर, मटर, मूंगफली, राजमा, सोयाबीन आदि को अंकुरित करके स्वादिष्ट सलाद चाट बनाकर खायें।
ज्यादा-से-ज्यादा खायें, प्रतिदिन 2.5 से 3.5 लीटर जल पीयें। हिमोक्रोमेटोसिस वाले रोगी आयरन वाला आहार, आयरन के बर्तन, आयरन की गोली, आयरन वाली सब्जियाँ तथा अन-कूक्ड शेलफिश नहीं खाये। इसी प्रकार विल्सन रोग को कॉपर वाले आहार चॉकलेट, गेहूं का चोकर, आलू, एवोकोडो, काबूली चना, टोफू, काजू, तिल तथा सूर्यमुखी के बीज शेलफिश लीवर, मशरूम, कॉपर वाले बर्तन एवं केन का प्रयोग नहीं करें।
लीवर वाले रोगी पूर्व में बताये गये सभी प्रोसेस्ड फूड, हाइड्रोजेनेटेड फैट, सेचुरेटेड फैट तथा ट्रान्स फैट से बने फास्ट फूड, बर्गर, पिज्जा, हॉट डॉग, फ्रेंच फ्राइज, चिप्स, सैंडविच, हेमबर्गर्स, ओनियन टिंग्स, चिकन नुग्गेट्स, फ्रायड चिकेन, टाकोस, आइसक्रीम, नमक व चीनी वाले आहार नहीं लें। लीवर में फैट के ज्यादा जमाव होने से इन्सुलिन का प्रभाव कम हो जाता है। जिससे इंसुलिन रेजिस्टेन्ट डायइबिटीज होता है। चीनी वाली चीजें ज्यादा खाने से तथा टाइप-2 डायबिटीज में रक्त में शुगर बढऩे से वह फैट में बदल कर लीवर में जमा हो जाता है जो लीवर को और अधिक डैमेज करता है। नमकीन वाली चीजें भी लीवर के कार्य को अस्त-व्यस्त कर देती हैं। उपयोगी बनाने एवं इंसुलिन को निर्माण के लिए कुछ फैट की आवश्यकता होती है, ताकि शरीर ग्लूकोज का उपयोग कर सके। इस दृष्टि से अलसी, काजू, बादाम, अखरोट, सभी प्रकार गहरी हरी सब्जियाँ आदि खायें, इनमें ओमेगा-3 फैटी एसिड होता है तथा मोनो सेचुरेटेड फॉलिक एसिड वाले आहार, सरसों, तिल, चावल, जैतून के तेल में कैफिक तथा फेरालिक एसिड, ओलियो कैन्थल आदि तत्व होते हैं जो लीवर हृदय एवं खून की नलियों में जमा नहीं होते हैं बल्कि ये दिमाग एवं हृदय को ताकत देते हैं।
लीवर में ट्रान्स फैट, हाइड्रोजेन टेड फैट तथा सेचुरेटेड फैट जमा होता है। अत: लीवर वाले रोगी ऐसे फैट से बने नमकीन, चाट, पकोड़े, पुडिय़ां, हलवा आदि बिल्कुल न खायें। कैण्डी, रेगुलर सोडा तथा अन्य किसी प्रकार की मिठाइयां, डब्बा बन्द फलों के रस, कार्बोनेटेड ड्रिंक आदि जिनमें शुगर, हाइ फू्रक्टोज, केन तथा कॉर्नसिरप, हाइ फ्रूक्टोज कॉर्नेसिरप, राइस सिरप वाले आहार नहीं लें, इससे लीवर खराब होता है।
लीवर के लिए कच्चा लहसुन अमृत तुल्य है। फलों में खट्टा-मीठे बेरीज जैसे स्ट्राबेरी, ब्लैकमलबेरीज, क्रेनबेरी, वोल्फ, गोजी, ब्लू, रस्पबेरीज मकोय सभी प्रकार की सब्जियाँ, विटामिन-ई वाले आहार गाजर, सूर्यमुखी का बीज, तिल, पम्पकिन, खीरा, ककड़ी, तरबूजा, खर्बूजा आदि बीज अंगूर में मौजूद रेस्वेराटॉल, सेलेवियम वाले आहार लें। लहसुन में मौजूद सेलेनियम तथा सल्फर मिलकर यकृत एवं ब्रेस्ट कैंसर तथा अन्य कैंसर के लिए यमदूत की तरह काम करता है। विटामिन-डी की कमी से गम्भीर फैटी लीवर होता है। इसके लिए प्रतिदिन कम-से-कम 40% निर्वस्त्र शरीर पर 45 मिनट धूप स्नान लें तथा मक्खन मलाई विहीन दूध दही खायें। NAFLD में प्राय: पोटेशियम की कमी होती है, इसके लिए केला, संतरा, खर्बूजा, खूबानी, पू्रन्स, किशमिश, खजूर, उबला ब्रोकोली, टमाटर, पालक, आलू, शकरकन्द, मशरूम, ककड़ी, खीरा, हरा मटर, खायें।
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