विश्व समुदाय में भारत का बढ़ता कद

विश्व समुदाय में भारत का बढ़ता कद

प्रो. रामेश्वर मिश्र पंकज

   जिसे इन दिनों विश्व समुदाय कहा जाता है, वह मुख्यत: समकालीन विश्व के शक्तिशाली राजनैतिक समूहों की ही संज्ञा है। संयुक्त राज्य अमेरिका, रूस, इंग्लैंड, फ्रांस तथा अन्य पश्चिम यूरोपीय राष्ट्र-राज्यों के राजनैतिक क्षेत्रों में जो कुछ बातें महत्व पाती हैं, उन्हें ही विश्व जनमत कह दिया जाता है। यह विश्व जनमत अर्थात् पश्चिमी यूरोपीय एवं रूस तथा संयुक्त राज्य अमेरिका के प्रभुवर्ग के मध्य का निर्माण सदा शक्ति के आधार पर होता रहा है। शक्तिशाली देश जिन बातों को उछालते हैं, सभ्यता और संस्कृति तथा प्रगति और विकास की जिन धारणाओं को उभारते हैं, उसे ही विश्व समुदाय का मत मान लिया जाता है। क्योंकि भारत में उत्तर एवं दक्षिण दोनों अमेरिका तथा अफ्रीका महाद्वीप के बारे में जानकारी लगभग शून्य ही रहती है और चीन या रूस के विषय में भी वास्तविक जानकारी बहुत कम रहती है। अत: विश्व समुदाय के नाम पर हम पश्चिमी यूरोपीय और संयुक्त राज्य अमेरिका के शक्तिशाली समुदायों के मत को ही जानते हैं।
ये शक्तिशाली समूह अपना मत शक्ति के आधार पर निरंतर बदलते रहे हैं। किसी समय इंग्लैंड और फ्रांस अपने मुँह से स्वयं को विश्व शक्ति कहते थे। उधर जर्मनी स्वयं को विश्व की महानतम और श्रेष्ठतम शक्ति कहता था। फिऱ महायुद्धों में इंग्लैंड और फ्रांस दोनों की पोल खुल गई और भारत तथा संयुक्त राज्य अमेरिका के बल पर वे किसी तरह जर्मनी से जीत पाये। तब संयुक्त राज्य अमेरिका और सोवियत संघ जो वस्तुत: अमेरिका, इंग्लैंड और फ्रांस के द्वारा पोषित लेनिन और स्तालिन को इन शक्तियों के द्वारा सौंपा गया था, वे ही दो महाशक्तियां कहलाने लगे। चीन जो अफ़ीम के नशे में डूबा हुआ दीन-हीन देश प्रचारित किया गया था और जिसके महान योद्धाओं को जर्मन सेनापति के नेतृत्व में अमेरिकी खेमे ने छल-बल से मार कर चीन से अरबों रुपयों की चांदी जुर्माने के रूप में वसूली थी और फिऱ चीन में अपनी शिक्षा थोप दी थी, जिससे राष्ट्रवादी और कम्युनिस्ट दो गुट तैयार हुये, उस चीन को अपनी रणनीति के अनुसार अचानक ईसाई पादरी लोग महान बताने लगे और अपने पुराने साथी च्यांग काई शेक से मुँह फेर कर माओ जे दुंग की प्रशंसा करने लगे। इस प्रकार अपने प्रभाव क्षेत्र वाले चीन को अचानक वे लोग महान बताने लगे और अपने सब से बड़े प्रतिस्पर्धी जापान को तथा जर्मनी को धूल में मिलाने की कोशिश और बदनाम करने की कोशिश करने लगे। अब चीन को खतरा देखकर फिऱ से जापान को विश्वास में ले रहे हैं। इस प्रकार शक्ति समीकरणों के आधार पर विश्व समुदाय में किसी भी समाज और राष्ट्र का कद घटता-बढ़ता रहता है।
कांग्रेस ने नेहरूजी के नेतृत्व में सोवियत ब्लॉक से स्वयं को जोड़ लिया। इसके कारण हजारों वर्षों से विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था रहे भारत को योजनापूर्वक भयंकर गरीबी से त्रस्त देश बताया जाने लगा और शासकों तथा प्रशासकों द्वारा सम्पूर्ण अर्थव्यवस्था अपने नियंत्रण में लेकर अंतहीन कमीशनखोरी और भ्रष्टाचार को भारतीय राज्य का लक्षण ही बना दिया गया। ऐसी स्थिति में भारत की छवि को नीचे गिराना, इसे सैन्य बल में पिछड़ा और कमजोर प्रचारित करना तथा शक्तिशाली देशों की दया का पात्र प्रचारित करना कांग्रेस की रणनैतिक आवश्यकता बन गई। इसके लिये देश का कद नीचे से नीचे जाय तो जाय।
2014 ईस्वी में सम्पन्न आम चुनावों के बाद श्री नरेन्द्र मोदी राष्ट्र के नेता बने और भारतीय राजनीति के लक्ष्य बदल गये। देश को शक्तिशाली और समृद्धि की ओर सामूहिक प्रयास करने वाला राष्ट्र बताना इस राजनीति की आवश्यकता हो गई। तदनुरूप ‘मेक इन इंडिया’से लेकर प्रबल सैन्य अभियानों तथा आतंकवाद और विस्तारवाद के मुखर विरोध तक भाजपा की राजनीति प्रबल होकर उभरी।
स्वाभाविक ही इससे विश्व समुदाय में भारत का कद लगातार बढऩे लगा। बराक ओबामा ने अपने राष्ट्रपति के रूप में दिये गये भाषण में स्पष्ट घोषणा की कि अमेरिका के दो मुख्य मित्र हैं - हिन्दू भारत और इजरायल। उसी नीति को डोनाल्ड ट्रम्प ने जारी रखा और जो बाइडेन भी उससे अलग नहीं जाने वाले। अमरीका में बार-बार मोदी जी का जो प्रचंड स्वागत हुआ तथा पश्चिमी यूरोप के अन्य प्रमुख देशों में भी जिस प्रकार स्वागत हुये, वे विश्व समुदाय में बढ़ते कद का प्रमाण है।
वैश्विक महामारी कोरोना के समय सम्पूर्ण टीकाकरण से लेकर करोड़ों लोगों को महीनों तक मुफ्त में राशन सुलभ कराने तक मोदी जी विश्व समुदाय में अद्वितीय और महान राष्ट्रनेता के रूप में उभरे और इसके साथ ही विश्व समुदाय में भारत का कद बढ़ता ही चला गया है।
अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस की वैश्विक स्तर पर घोषणा और आयोजन इसी बढ़े हुये कद का लक्षण और परिणाम है। भारत की ओर अब विश्व जनमत प्रत्येक महत्वपूर्ण विषय पर जिज्ञासा के साथ देखता है। रूस और यूक्रेन के युद्ध में भारत अकेला ऐसा महत्वपूर्ण देश है, जिसने दोनों ही खेमों से गरिमापूर्ण मैत्री बनाये रखी है। यह विश्व समुदाय में भारत के बढ़े हुये कद के कारण संभव हुआ है। अन्यथा रूस और संयुक्त राज्य अमेरिका दोनों ही हर देश पर यह दवाब डालते हैं कि वह खुल कर केवल उनके साथ रहे। भारत पर यह दबाव डालना संभव नहीं हुआ है जो स्वयं में विश्व समुदाय में भारत की साख और प्रतिष्ठा की वृद्धि का प्रमाण है।

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