चर्म रोग (फोड़ा)

पतंजलि वैलनेस इंटिग्रेटेड थेरेपी

चर्म रोग (फोड़ा)

      डॉ. नागेन्द्र नीरज 

निर्देशक व चिकित्सा प्रभारी -

योग-ग्राम, पतंजलि योगपीठ, हरिद्वार

जिनका तन तथा मन स्वच्छ एवं स्वस्थ है, रोग प्रतिरोधक शक्ति शक्तिशाली है, उनके रोमकूपों के अंदर फोड़ा पैदा करने वाले जीवाणु प्रवेश नहीं करते हैं। पहले से जीवनीशक्ति प्रबल होने से त्वचा पर पल रहे कीटाणु बाल भी बाँका नहीं कर पाते हैं। अत: इन कीटाणुओं के पनपने एवं भोजन के लिए शरीर में संचित गन्दगी एवं मृत जैव पदार्थ आवश्यक है।  
लक्षण प्राय: रोम कूपों की जड़ों में प्रारम्भ में तीव्र रूप से लाल, स्पर्श से दर्द तथा राई के दाने से लेकर मटर के बराबर सूजन वाली ग्रंथि बन जाती है। सूजन धीरे-धीरे बैठ जाती है या बढक़र काफी पीड़ादायक बन जाती है। चार-पाँच दिनों में उसमें मवाद पड़ जाती है, त्वचा फट जाती है। उसमें से सड़ा भाग रक्त मिश्रित मवाद तथा कील के रूप में निकल जाता है। जब तक कील नहीं निकलता है तब तक घाव सूखता नहीं है। धीरे-धीरे घाव रोहण अंकुरों से भर जाता है। शरीर के किसी भी स्थान पर फोड़ा हो सकता है। किसी समय एक या कभी-कभी एक साथ बहुत सारे अथवा महीनों तक नये-नये फोड़े निकलते रहते हैं। सामान्यत: फोड़े मृदु: किन्तु कष्ट साध्य रोग है, परन्तु असाध्य नहीं है। जब ये होठ पर होते हैं तो सेप्टीसिमिया के कारण अकाल मृत्यु का कारण बनते हैं।

कारण -

जब शरीर दूषित विजातीय पदार्थों से विषाक्त हो जाता है, उस स्थिति में रोम कूपों में स्टेफलोकोकस एल्वस स्टेफीलोकोकस ओरियस तथा स्टेफ्रलोकोकस साइट्स सक्रिय फोड़े की नींव डालते हैं। बाद में अन्य कीटाणु स्टेफ्रलोकोकस पायोजेनिन ऑरियस तेजी से बढक़र घाव को उग्र बनाते हैं। बालों के टूटने से त्वचा के अंदर गड्ढ़े बन जाते हैं जिसमें बैक्टीरियम स्टेफ्रलेकोकस ओरियस अंदर प्रवेश कर फोड़ा पैदा करते हैं। जिनका तन तथा मन स्वच्छ एवं स्वस्थ है, रोग प्रतिरोधक शक्ति शक्तिशाली है, उनके रोमकूपों के अंदर फोड़ा पैदा करने वाले जीवाणु प्रवेश नहीं करते हैं। पहले से जीवनीशक्ति प्रबल होने से त्वचा पर पल रहे कीटाणु बाल भी बाँका नहीं कर पाते हैं। अत: इन कीटाणुओं के पनपने एवं भोजन के लिए शरीर में संचित गन्दगी एवं मृत जैव पदार्थ आवश्यक है। मधुमेह, आँतों में सूजन, त्वचा की अस्वच्छता, कब्ज, गुर्दे, फेफड़े तथा यकृत की खराबी, मोटापा, स्थूलता से ग्रस्त रोगियों जिनकी देह में दूषित पदार्थ काफी मात्र में होते है, उनमें ही फोड़े की शिकायत ज्यादा पायी जाती है। फोड़ा स्थानीय रोग न होकर सारे शरीर की विषाक्रान्तता का लक्षण मात्रा है। शरीर विषाक्रांत होने पर पेशाब, पाखाना तथा पसीने से दूषित वस्त्रों का सम्पर्क त्वचा के किसी भी अंग में होने से नये फोड़े हो जाते हैं। जिस अंग में दूषित पदार्थों की अधिकता के कारण प्रतिरोधक क्षमता दबी-कुचली होती है, वहाँ पर एक से अधिक फोड़े उठ जाते हैं। ये फोड़े नितम्ब, जंघा, छाती, योनि, गाल तथा नाक कहीं भी हो सकते हैं। ये फोड़े अत्यन्त कष्ट कारक होते हैं।

दुष्ट फोड़ा, जहरवाद या कार्बंकल -

लक्षण- सामान्य फोड़े में एक मुँह होता है, परन्तु दुष्ट फोड़े में एक से अधिक मुँह होते हैं। यह त्वचा के नीचे तक फैला रहता है। दुष्ट फोड़ा पीठ, ग्रीवा, जंघा तथा माथे पर होता है। त्वचा के पास शल्क पैदा हो जाते हैं। शरीर के किसी भी भाग में दुष्ट फोड़ा हो सकता है। जहाँ भी दुष्ट फोड़ा निकलने को होता है। वहाँ की त्वचा सर्वप्रथम लाल, सख्त एवं गर्म हो जाती है। सुर्खी, स्पर्श में दर्द तथा सूजन चारों तरफ  के तन्तुओं में फैलती है। रोगी ज्वर तथा काफी कमजोरी महसूस करता है। नाड़ी तीव्र, किन्तु क्षीण चलती है। पाँच-छ: दिन के अंदर कई छोटे-छोटे मुँह बन जाते हैं। उनमें मवाद भर जाता है। एक डेढ़ सप्ताह में वहाँ के तन्तु संक्रमित होकर नष्ट हो जाते हैं। उसके चारों तरफ एक बड़ा सा चक्रपैदा हो जाता है।
कारण- सामान्य फोड़े की तरह दुष्ट फोड़े का मुख्य कारण बैक्टीरियम स्टेफ्रलोकोकस पायोजेनीस ऑरियस ही है। जिस व्यक्ति के शरीर में दूषित विजातीय पदार्थ, कूड़ा-करकट का जमघट सहनीय सीमा से अत्यधिक हो जाता है, खून अम्लीय तथा प्रदूषित हो जाता है, रोग प्रतिरोधक क्षमता अत्यन्त निर्बल एवं क्षीण हो जाती है, उनके शरीर में दुष्ट फोड़े का जन्म होता है। मधुमेह से ग्रस्त रोगियों में दुष्ट फोड़े ज्यादा होते हैं। दुष्ट फोड़े होते ही रक्त तथा मूत्र में शर्करा की जाँच अवश्य करायें। दुष्ट फोड़े की आयुर्वेद में प्रमेह पिण्डिकायेंके नाम से चर्चा की गई है।

सामान्य घाव:

लक्षण- शरीर के किसी भी हिस्से में मवादयुक्त फोड़ा-फुंसी तथा पिंड रचना को घाव कहते हैं। फोड़े की तरह यह सुर्ख, सख्त एवं दर्द वाला होता है। कब्ज, अनिद्रा, सिरदर्द, ज्वर, दुर्गन्धित सांस, सफेद जिह्वा आदि लक्षण दिखते हैं। धीरे-धीरे आक्रांत त्वचा पतली होकर फट जाती है। पीले रंग का मवाद बाहर निकल जाता है। इस मवाद के संक्रमण से अन्य जगहों पर भी फोड़ा-फुंसी तथा घाव हो सकता है।
कारण- जिस अंग की प्रतिरोध क्षमता कम हो जाती है तथा साफ-सफाई की अभाव में वहाँ कीटाणुओं का आक्रमण बढ़ जाता है। फलत: फोड़ा, फुंसी तथा घाव होता है। स्टेफिलोकोकी नामक कीटाणु के कारण फोड़े-फुंसी होते है, परन्तु कभी-कभी टु्यबरकल आर्गेनिज्म के कारण भी फोड़ा या घाव होता देखा गया है।

शैय्या घषर्ण बेड प्रेशर अल्सर: -

दुर्घटनाग्रस्त, लकवाग्रस्त एवं कुछ ऐसे असाध्य शारीरिक एवं मानसिक रोगी, जिन्हें हमेशा बिस्तर पर पड़े-पड़े शेष जीवन बिताना पड़ता है, ऐसी स्थिति में पड़े रहने से उनके अस्थि वाले हिस्से में जैसे- नितम्ब, कंधे के पीछे, जंघा, गुल्फ  तथा कोहनी पर बार-बार बिस्तर की रगड़ एवं दबाव से घाव हो जाता हैं। इसे ही शैय्या उष्णव्रण या शैय्या घर्षण व्रण, विस्तर दाब व्रण, प्रेशर अल्सर, बेडसोल, डेसुबिटस तथा प्रेशर अल्सर शैय्या व्रण कहते हैं। रोगी का बिस्तर सिकुडऩे नहीं पायें, बिस्तर पर रोटी या भोजन का कोई टुकड़ा नहीं हो, करवट दिलाते रहें। प्रतिदिन नीम के पानी का स्पंज बाथ स्नान करायें। बेड पेन का प्रयोग अत्यन्त सावधानी से करें। समयान्तराल पर करवट बदलने में सहायता करें।
सन् 1991 की बात है-
140 कि.ग्रा. के रोगी एस.एम.एस. अस्पताल जयपुर से डिस्चार्ज होकर मेरे पास भर्ती रहे। नितम्ब पर भयंकर बेडसोल, प्रेशर अल्सर हो गया था। डेढ़ इंच तक घाव के अन्दर गड्ढ़ा हो गया था, उन्हें नीम के पत्ते को गाय के घी में भूनकर बारीक पीसकर उस नीम मलहम की ड्रेसिंग करना प्रारम्भ किया। प्राकृतिक आहार, रसोपवास तथा हल्का उपचार से कमाल का असर हुआ। 25 दिन में 80 फीसदी तक लाभ हो गया। 35-40 दिन में घाव साफ हो गया तथा कुछ दिन रहकर स्वस्थ होकर गये।

घमौरी, अलाई, गर्मी की चुभती दाने -

लक्षण- सारे शरीर की स्वेद ग्रंथियों में सूजन, जलन एवं पीड़ा होती है। सरसों के दाने से भी छोटी नन्ही-नन्ही फुंसियाँ, जंघा, छाती, पीठ तथा कन्धे पर होती है। गरमी तथा बरसात के दिनों में जब वातावरण में नमी ज्यादा होती है तो गर्मी एवं नमी के मिलन से त्वचा पर घमौरी का प्रकोप ज्यादा होता है।
कारण- घमौरी में रोम कूप बंद हो जाते हैं। उसके अंदर गन्दगी जो पसीने के रूप में निकल जानी चाहिए, संचित होती रहती है। सीमा से अधिक होने पर शरीर उस गन्दगी को छोटे-छोटे व्रण, घमौरी के रूप में बाहर निकालता है। पॉउडर आदि लगाकर इसे बंद नहीं करें। बच्चों तथा मोटे लोगों में घमौरी ज्यादा होती है। इसे मिलेरी भी कहते हैं। पसीने के कारण रोगाणुओं के संक्रमण से घमौरी उग्र रूप धारण कर लेता है। एक्सपायरी क्रीम, नींद का पूरा नहीं होना, अपचन, तनाव, कब्ज आदि कारणों से वसा ग्रंथियों से निकलने वाला स्राव रूक जाता है। त्वचा के नीचे इकठ्ठा होकर फुंसी पैदा करता है। बाद में सख्त होकर मुहासा बन जाते है। इसे एग्ने वल्गेरिस कहते है। इसमें मवाद पड़ जायें तो इसे कील-मुहांसा या पिम्पल कहते है। ये कई प्रकार के होते है :-
1. हल्के या नेवस कॉमेडोनिकस- इस श्रेणी में ब्लैक हेड्स तथा हवाइट हेड्स आते है। इनका मुख्य कारण फाइब्रोब्लास्ट ग्रोथ फैक्टर-2 रेसेप्टर में सोमेटिकम्यूटेशन होने से होते हैं। इसके उपचार की आवश्यकता नहीं होती है।
2.  मध्यम या पुस्टुल एक्ने में हल्की सूजन तथा हल्की मवाद भी जमा हो जाती है।
3. नोडयूल्स एक्ने गंभीर किस्म का होता है। इसमें सूजन के साथ पीले रंग की मवाद भर जाती है। मवादयुक्त गांठों में जलन, दर्द, सूजन तथा लालिमा होती है। इनको दबाने पर काला एवं सफेद पदार्थ निकलता है एवं छेद दिखता है। बार-बार दबाने से चेहरे पर धब्बे पड़ जाते हैं। जिससे किशोर कुंठित होकर तनाव के शिकार होते है।
उपचार- घमोरियों या प्रिकली हीट में शरीर को ठण्डा रखें, पसीना होने पर नीम के पानी का स्पंज बाथ एवं पानी में डिटॉल की 2 से 4 बून्दे डालकर स्नान करें। पसीना साफ करें। बर्फ के पानी से सेंक करें। सूती वस्त्र पहनें। ओट मील का उबटन लगाये। बेकिंग सोडा और पानी का पेस्ट भी लगा सकते हैं। एलोविरा जैल का प्रयोग करें। चंदन का भी प्रयोग दिया जा सकता है। सहजता से जो साधन उपलब्ध हो जाये प्रयोग करें।

प्राकृतिक योग चिकित्सा-

पेट को 3 मिनट गरम, दो मिनट ठण्डा क्रम से तीन बार देने के बाद मालिश करें। नीम के पत्ते उबले पानी का समशितोष्ण करके एनिमा 3 से 5 दिन तक लगातार दें। उपचार में नीम के पानी को गरम पैर स्नान, नीम के पानी में गीली चादर लपेट, नीम के पानी का भाप स्नान दें। स्थानीय फोड़े  पर 2 से 3 दिन तक 3 मिनट गरम 2 मिनट ठण्डा सेंक देने से तुरन्त लाभ मिलता है तथा वह शीघ्र पक जाता है। दबाने पर कील समेत मवाद निकल जाती है। दो-तीन दिनों तक घाव के चारों तरफ  नीम के पत्ते को पीसकर बांधते रहें। अतिशीघ्रता से घाव भर जाता है और आराम आ जाता है। 
आहार मे 3 से 5 दिन तक गाजर, लौकी, खीरा, पालक, चुकन्दर आदि का रसाहार, फलाहार तथा दो दिन सिर्फ पानी पर उपवास करायें। उपवास के दौरान पूर्ण विश्राम सर्वांग मालिश, नीम के पानी से एनिमा तथा स्नान, अनुलोम-विलोम प्रणायाम, कपालभाति क्रिया, बाहृय प्राणायाम, भ्रामरी तथा उद्गीथ प्राणायाम करें। उपवास के बाद एक दिन गाजर या संतरे के रस पर रहे तत्पश्चात् भोजन में 2 या 3 रोटी, दलिया, पालक, टमाटर, लौकी, टिण्डा, तरोई, चिचिड़ा आदि मौसम के अनुसार सब्जी तथा फल दें।
आयुर्वेद एवं जड़ी-बूटी चिकित्सा- दिव्य कायाकल्प क्वाथ तथा दिव्य मुलेठी क्वाथ 200-200 ग्राम मिला लें। उनमें से 10-15 ग्राम लेकर 400 मि.ली. पानी में पकायें। 100 मि.ली बच जाने पर सुबह खाली पेट तथा सायं भोजन के एक घंटा पूर्व लें। दिव्य नीम घनवटी, दिव्य गिलोय घनवटी तथा दिव्य इम्यूनोग्रीट की 1-1 वटी गुनगुने जल से लें। दिव्य हीलोम आइटमेन्ट का स्यानिक प्रयोग करें।
पतंजलि न्यूटे्रल डेली एक्टिव दिन में 2-2 कैप्सूल सुबह-शाम गुनगुने जल से लें। व्रण प्रक्षालन, व्रण धूपन, व्रण वस्ति, पंचकर्म चिकित्सा लें।
उपचार से बेहतर है बचाव- भोजन में ज्यादा तेल, घी, मसाले, नमक, चीनी ट्रान्सफैट, सेचुरेटेड फैट, फास्ट फूड, पिज्जा, बर्गर, हॉटडॉग, हेम्बर्गर, प्रोसेसफूड, कन्फेक्शनरी फूड, समोसा, कचौरी आदि तले हुए आहार, सोडा ड्रिंक, कैफिनयुक्त एनर्जी ड्रिंक, कृत्रिम फलो के रस वाले आहार न लें। चिकनाई वाले कॉस्मेटिक प्रसाधन प्रयोग नहीं करें। बालों में ज्यादा तेल लगाने से बचें। कच्ची सब्जियों में गाजर, चुकन्दर, कच्ची हल्दी, पालक, टमाटर, ककड़ी, खीरा, लौकी, टिण्डा, धनिया आदि का रस एवं सलाद बनाकर खायें। प्रतिदिन 10-15 ग्लास जल पीयें। प्रात: काल नीबू पानी शहद लें। ताजी स्वच्छ हवा में आसन, प्राणायाम करें एवं भ्रमण करें। मुहॅासे के साथ छेड़छाड़ न करे। चेहरे को छूने, दबाने, फोडऩे, रगडऩे से परहेज करें। चेहरे को धोकर नीम के पानी की भाप लें तथा नीम के पत्तों को पीसकर उसका पेस्ट चेहरे पर लगायें। नीम पानी में भीगी मुल्तानी मिट्टी को मक्खन की तरह गूंदकर इसमें नीबू रस मिलाकर चेहरे पर लगायें। रात्रि को 3-3 ग्राम चिरायता एवं कुटकी भीगो दें। सुबह उसे मंद आँच पर 20 मिनट तक उबाले, ठण्डा होने पर पी जायें।
गांठ युक्त सिस्टिक पिम्पल्स, नोडयूल्स, पेपुल्स आदि अनेक पिम्पल्स के रूप एवं आकार है, इन से बचें।

Advertisment

Latest News

शाश्वत प्रज्ञा शाश्वत प्रज्ञा
जीवन का सत्य 1.  पराविद्या- मनुष्य जब ईश्वरीय सामथ्र्य अर्थात् प्रकृति या परमेश्वर प्रदत्त शक्तियों का पूरा उपयोग कर लेता...
2000  वर्ष के पूर्व के आयुर्वेद और वर्तमान समय के आयुर्वेद की कड़ी को जोडऩे का माध्यम है
जड़ी-बूटी दिवस के अवसर पर पतंजलि योगपीठ हरिद्वार में एक लाख पौधों का निशुल्क वितरण एवं वृक्षारोपण
78वें स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर पतंजलि योगपीठ में ध्वजारोहण
साक्ष्य आधारित लिवोग्रिट एक प्रभावी और सुरक्षित औषधि
प्रकृति की प्रयोगशाला में निर्मित कार्बनिक अंकुरित अमृतान्न आयु, आरोग्य जीवन को बनाता है महान
ज्ञान से रहित भावना को  ‘भक्ति’ नहीं कहते
स्वास्थ्य समाचार
मधुमेह लाइलाज नहीं है
पतंजलि विश्वविद्यालय में शल्य-तंत्र आधारित तीन दिवसीय ‘सुश्रुतकोन’ सम्मेलन का समापन