परम पूज्य योग-ऋषि श्रद्धेय स्वामी जी महाराज की शाश्वत प्रज्ञा से निःसृत शाश्वत सत्य...
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|| ओ३म् ||
योग का अर्थ है सम्यक् मति, भक्ति, कृति, प्रकृति एवं संस्कृति से युक्त होकर समता तथा कुशलतापूर्वक स्वधर्म, आत्मधर्म, राष्ट्रधर्म, सेवाधर्म एवं मानवधर्म का प्रामाणिकता के साथ निर्वहन करना। योग संसार का सबसे श्रेष्ठ शब्द एवं योगाभ्यास व्यक्ति, परिवार, समाज, राष्ट्र एवं विश्व के विकास, समृद्धि, सुख-शान्ति, निर्माण एवं निर्वाण (मोक्ष-मुक्ति- कैवल्य-पूर्णता) की प्राप्ति का समग्र, स्थाई, शाश्वत व वैज्ञानिक मार्ग, माध्यम या साधन है।
अष्टाङ्ग योग, राजयोग, हठयोग, ज्ञानयोग, भक्तियोग, कर्मयोग, मंत्रयोग, लययोग, कुण्डलिनी योग, प्रतिप्रसव या कैवल्य योग आदि योग साधना के साधन रूप मार्गों की प्रधानता की दृष्टि से विभिन्न नाम हैं, वस्तुत: योग में कोई भिन्नता नहीं है। योग एवं कर्मयोग, प्रार्थना एवं पुरुषार्थ, विश्राम एवं श्रम, प्रारब्ध एवं पुरुषार्थ इन दो-दो शब्दों में जीवन का सम्पूर्ण सत्य समाहित है।
योग को मैं दो रूपों में प्रमुखतया देखता हूँ एक योग का व्यवहारिक रूप, स्वरूप, अभ्यास या दर्शन। मेरा अध्ययन, अनुसंधान एवं स्वयं पर तथा समष्टि के करोड़ों लोगों पर अनुभव के आधार पर यह मानना है कि यदि प्रत्येक मनुष्य प्रात: एक-दो घंटा योगासन, व्यायाम, प्राणायाम एवं ध्यान आदि का अभ्यास कर ले तथा शेष दिन भर योगयुक्त, अष्टाङ्ग योग या ज्ञानयोग के अनुरूप एक श्रेष्ठ दिव्य नैतिक या आध्यात्मिक आचरण करे तो संसार में किसी भी प्रकार की कोई भी समस्या, रोग, तनाव, दु:ख, दरिद्रता, हिंसा, झूठ, बेईमानी, आपाधापी, आत्मघात, विश्वासघात, अशुचि, असंतोष, अन्तद्र्वन्द्व या आत्मविमुखता एवं नास्तिकता आदि कोई भी दोष शेष नहीं रहेगा।
सभी रोगों, तनावों, हिंसा एवं युद्धादि से संसार को बचाने का एकमात्र कोई मार्ग है, तो वह योग ही है। मैं सब राष्ट्र व विश्ववासियों से आत्मीय विनम्र प्रार्थना व आह्वान करता हूँ कि सब बच्चे विद्यार्थी, युवक-युवतियाँ, सभी जाति, वर्ग, मजहब एवं सभी देशों के नागरिक बिना किसी दुराग्रह एवं भेदभाव के एक बार योग करना प्रारंभ करें। इसका परिणाम अप्रतिम, अतुल्य एवं बहुत ही महान् या श्रेष्ठ होगा। सम्पूर्ण विश्व योग से ही पूर्ण सुखी, स्वस्थ, समृद्ध, दिव्य एवं भव्य बनेगा, आध्यात्मिक व्यक्ति, समाज, राष्ट्र एवं आध्यात्मिक विश्व का निर्माण होगा।
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