इसलिए हम सबको योगी बनना है

इसलिए हम सबको योगी बनना है

आचार्य बालकृष्ण

योग संदेश के प्रत्येक अंक में पाठकों तक अत्यन्त रोचक व महत्त्वपूर्ण लेख पहुँचे तथा उसके प्रति पूरे देश में एक श्रेष्ठ सात्त्विक आकर्षण बने इसलिए हम प्रत्येक अंक में एक गुणात्मक सुधार करेंगे। पिछले अंक में हमने आरोग्य दर्शन एवं जीवन दर्शन पर गंभीरता से प्रकाश डाला। इस अंक में हम योग एवं जीवन में योग के विभिन्न पहलुओं पर विशेष प्रकाश डाल रहे हैं।
में योग चेतना, दिव्य चेतना, आत्म चेतना, गुरु चेतना, ऋषि चेतना, ब्रह्म चेतना में जीना है। जो योग चेतना में जीते हैं, उनके तन, इन्द्र्रियों, मन, बुद्धि, आत्मा का सामथ्र्य बहुत अधिक बढ़ जाता है।
  • योग ही एक मात्र समाधान है क्योंकि जो भी कार्य एकाग्रता, पवित्रता, कुशलता, नियम पूर्वक किया जाता है, विधि-निषेध का ध्यान रखकर किया जाता है, वह योग है।
  • योग में इस सृष्टि की सारी दिव्यताएँ समाहित हैं। एक-एक श्वास से लेकर के जीवन का हर कर्म, पहलू जो दिव्यता के साथ निष्पन्न हो रहा है, वो सब योग है।
  • योग दुर्विचार, दुर्भावना, दुष्कर्म व अशुभ प्रवृत्तियों से मुक्ति का एक मात्र उपाय है।
  • योग एक जीवन, चिकित्सा और साधना पद्धति है। योग जीवन का श्रेष्ठ सात्विक अभ्यास है। योग आहार, विचार, वाणी, स्वभाव के परिष्कार का सबसे श्रेष्ठ साधन है, आत्म उपचार से लेकर के आत्म साक्षात्कार का एक व्यवहारिक मार्ग है।
  • सब रोगों, तनावों, सब प्रकार की बीमारियों व बुराइयों से मुक्ति और अशुभ की समाप्ति तथा शुभ की प्राप्ति का उपाय है योग।
  • जीवन के हर संदर्भ में दृष्टि व कृति में समग्रता, संतुलन, न्याय यह योग का दर्शन है। मति, भक्ति, कृति, प्रकृति, संस्कृति में समग्रता का दर्शन है योग दर्शन।
  • योग दिव्यता के बीज बोता है इसलिए इसको बीज मंत्र कहते हैं। यह दिव्य जीवन के बीज बोता है, हमारे भीतर उनको विकसित करता है और जो अशुभ के बीज है उनको निर्बीज करता है, निर्बीज समाधि तक हमको पहुँचाता है।
  • योग आत्मज्ञान और ब्रह्मज्ञान का मार्ग है, इसके अलावा दुनिया में कोई और पथ है ही नहीं सुखी होने का, सब प्रकार के दु:खों के पार जाने का।
  • संसार में सब प्रकार का वैभव, ऐश्वर्य है लेकिन यदि अपना मन सुखी नहीं है तो सुखी नहीं हो सकते और मन का सबसे बड़ा दु:ख है हम अपने भीतर एक अपूर्णता, अधूरापन अनुभव करते हैं। इसलिए योग में कहते हैं कि मैं स्वयं में पुर्ण हूँ, सृष्टि भी अपनी पूर्णता, दिव्यता में प्रतिष्ठित है, यह है योग का सिद्धांत।
  • योग दिव्य जन्म देता है। एक जन्म माँ की कोख से होता है उसे भौतिक जन्म कहते हैं और दूसरा जन्म योग से होता है उसे दिव्य जन्म कहते हैं।
  • योग मूलत: जीवन का एक श्रेष्ठ, सात्विक, वैज्ञानिक व पूर्ण निर्दोष दिव्य अभ्यास है और हमारे सम्पूर्ण अस्तित्व को श्रेष्ठतम बनाने का, हमारे शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक, आध्यात्मिक, सम्पूर्ण चेतना के विकास का सबसे बड़ा माध्यम है।
  • योग का मूल दर्शन है सभी व्याधियों की समाप्ति, समाधि की प्राप्ति। समाधि मतलब समाधान, जीवन में संपूर्णता, समग्रता, दिव्यता, पूर्णता।
  • योग की यात्रा ज्ञात से अज्ञात की, प्रत्यक्ष से परोक्ष की, मूर्त से अमूर्त की, व्यक्त से अव्यक्त की, विश्वमय से विश्वातीत होने की, सद्गुणों से युक्त होकर गुणातीत होने की, सब दिव्य भावों से युक्त हो करके भावातीत होने की साधना है।
  • प्राणायाम को एक अनुष्ठान की तरह करना चाहिए। प्राणों का आधान करके प्रभु की सम्पूर्ण दिव्यताओं का अपने भीतर आधान करना व भाव, अनन्त ज्ञान, प्रेम, करुणा, सुख, शांति, उत्साह, निर्भयता से युक्त होकर उस प्रभु का आधान करना, यह प्राणायाम का आध्यात्मिक पहलू है।
  • आज हर रोग के लिए अलग दवा और अलग डॉक्टर का भयंकर चक्रव्यूह है। योग ही इसकी एकमात्र औषधि है।
  • योग मात्र एक क्रियाकलाप नहीं है, योग इस जीवन का सम्पूर्ण विज्ञान, सत्य और समाधान है। योग जीवन का सम्पूर्ण स्वास्थ्य, सुख, शांति, संतुष्टि, प्रसन्नता, सफलता, प्रयोजन और पुरुषार्थ है।
  • योग का अर्थ है कि भगवान् के साथ एकाकार हो जाना। श्रम और विश्राम, पुरुषार्थ और प्रार्थना, ये जीवन के दो बड़े आधार है। ध्यान एक क्षण में ही घटित हो जाता है बस उसकी निरंतरता बनी रहे, इसी का नाम अभ्यास है।
  • योग प्रार्थनामय, ज्ञानमय, करुणामय, सुखमय, शांतिमय, आनन्दमय, भक्तिमय, कर्ममय, पुरुषार्थमय, परमार्थमय है।
  • योगी शरीर, मन, इन्द्रियों को नियंत्रित कर लेता है, यह जीवन की बहुत बड़ी बात है। यदि व्यक्ति शरीर, मन और इन्द्रियों पर नियंत्रण कर ले तो जीवन में कभी कोई गलत काम नहीं कर सकता है।
  • योग से आप अपने ऊपर अनुशासन कर लेते हैं। विश्व विजेता होना बड़ी बात है, लेकिन उससे भी बड़ी बात है आत्म-विजेता होना।
  • योगाभ्यास करने से हमारा शरीर बलवान्, मस्तिष्क प्रज्ञावान्, हृदय श्रद्धावान् बनता है। हम संस्कारवान् और चरित्रवान् बनते हैं, जीवन में ऐश्वर्यवान् बनते हैं और हम महान् बनेंगे तो हमारा भारत महान् होगा- यह है व्यक्ति निर्माण से राष्ट्र निर्माण, चरित्र निर्माण से राष्ट्र निर्माण, युग निर्माण की यात्रा, योग की यात्रा।
  • हमारे भीतर अच्छाई, बुराई दोनों चीजें हैं। योग अच्छाई को शिखर पर पहुँचा देता है और बुराई को निर्बीज कर देता है।
  • योग का अर्थ है परमात्मा के दिव्य ज्ञान से, भाव से, शक्ति से जुड़ जाना। हममें जो ज्ञान, भाव, क्रिया शक्ति है, उसका मूल आधार परमात्मा है।
  • भगवान् के दिव्य ज्ञान से, प्रेम से, संवेदनाओं से, भगवान् की दिव्य शक्ति, सामथ्र्य से जुडऩा योग है।
  • योगाभ्यास करते हुए हम हमेशा भगवान् के साथ एकात्म रहें, इसी को जीवन मुक्ति कहा जाता है अर्थात् समस्त कार्यों का निष्पादन करते हुए हम ब्रह्म के साथ एकात्म रहें।
  • योग कोई विशिष्ट विषय नहीं है, पूरा जीवन ही योग है। जो भी पवित्रता, एकाग्रता और मर्यादा में किया जाता है, वह सब योग है।
  • योग यात्रा है आत्म उपचार से आत्म साक्षात्कार की। एक शब्द में कहें तो योग में मनुष्य की सब समस्याओं का समाधान है, इसलिए हम सबको योगी बनना है।
  • सबसे बड़ा लाभ, सबसे बड़ी विजय और उपलब्धि योग की और सबसे बड़ा सुख, काम, धर्म योग का है। सबसे श्रेष्ठ पद्धति योगमयी जीवन पद्धति है।
  • सबसे बड़ा अभियान, आंदोलन, अनुष्ठान, यज्ञ, सबके जीवन की सबसे बड़ी माँग, मूल आवश्यकता यदि कोई है तो वह योग है।
  • हमारा शरीर वज्र की भाँति होना चाहिए, जो बलहीन होते हैं उनका अस्तित्व मिट जाता है इसलिए बल की उपासना करो। सबसे बड़ा बल है योग बल और योग बल से बढ़ता है आत्म बल, बुद्धि बल, हृदय का बल, संवेदनाओं का बल, सामथ्र्य का बल।
  • इस पिंड और ब्रह्माण्ड में अच्छी बातें बहुत हैं लेकिन उसमें सबसे बड़ा श्रेष्ठ तत्व है, योग तत्व। योग करने से सब निरोगी हो जाते हैं।
  • योग में जो सर्वाधिक रूपांतरण होता है वो प्राणायाम और ध्यान से होता है। प्राणायाम का पुरुषार्थ और ओंकार, गायत्री के साथ प्रार्थना- प्रार्थना और पुरुषार्थ साथ-साथ करना है।
  • सुबह-सुबह योग करो फिर दिन भर जो करोगे वह अच्छा ही होगा। जो योग करेगा वह कभी भी मानवीय मूल्यों से हट नहीं सकता, डिग नहीं सकता और मानवता बढ़ेगी।
  • प्राणायाम सबसे बड़ा तप है और ओंकार सबसे बड़ा जप है। प्राणायाम का तप और मन ही मन ओंकार का जप ये जब दोनों एक साथ होते है तो हमारा शरीर, इन्द्रियाँ, अंत:करण, मन, बुद्धि, चित्त, हमारी आत्मा और अस्तित्व दिव्य हो जाते हैं।
  • जीवन योग है, यज्ञ है। जीवन एक संघर्ष है, साधना है। जीवन एक युद्ध है। योगी हो करके जीवन का युद्ध हमें करना है और जीतना है।
  • योग सबके लिए है, योग करने से आपके अंदर दिव्यता आएगी, कुशलताएँ बढ़ेंगी, प्रशन्नता बढ़ेगी, आप स्किलफुल, प्रोडक्टिव व इनोवेटिव होंगे।
  • योग के द्वारा हमारे भीतर दिव्य रूपांतरण घटित होता रहता है। कितनी भी बीमारियों ने क्यों न घेर लिया हो, मौत के मुख से भी योग आपको बाहर निकाल कर लाएगा। योग से नया जीवन मिलेगा।
  • योग हमारा स्वभाव है, योग हमारी संस्कृति है, योग हमारा धर्म है। योग धर्म से ही अध्यात्म धर्म, राष्ट्र धर्म, मानव धर्म, विश्व धर्म में हम प्रतिष्ठित है।
  • सुबह उठ करके जिस दिन यह संसार योगाभ्यास और अष्टांग योग के अनुकूल योग युक्त आचरण करने लग जाएगा, उस दिन यह योगमय विश्व सुखमय, शांतिमय, पूर्ण समृद्धिमय बन जाएगा।

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